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महफ़िल में ख़ामोश देखकर तुझे अजीब सा लग गया
सब वाह वाह कर रहे थे बस एक तू ख़ामोश रह गया!!


अभी कलम को हाथ ही लगाया था
स्याही सुखी हुई मिली कल ही तो लाया था
खुद को लिखने बैठा तो स्याही सुखी हुई मिली
दवात उठाई तो वो भी खाली मिली !!


मैं वो किताब हूं जिसे अधूरा पढ़कर छोड़ दिया गया
हर बार की तरह शिकायत थी मुझे समझा ना गया!!


जख्म हमारे सारे नासूर बन गए।
जब से वो हमारी नज़रों से दूर हो गए
लिखना तो बहुत कुछ था अभी हमे
गुमशुदा सारे लफ्ज़ अपने अल्फ़ाज़ में हो गए!


एक ख़्वाब की हसरत में जल बुझी हमारी आँखें
वो एक ख़्वाब था जो मुक़म्मल ना हो पाया हमारा!


मैं अज़ीयत में हूं अभी लिख नही पाऊंगा
लिख भी दूं तो ज्यादा नही लिख पाऊंगा
ढल के आऊंगा किसी दिन अलग अंदाज़ में
आज लिखा तो बेहतर नही लिख पाऊंगा








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