میں زخم ہوں Urdu poetry by zishan alam
میں زخم ہوں— وہاں جا کر کس سے ملتا، نمک سے بھیگے کپڑے وہاں سب نے پہنے تھے۔ ہر چہرے پر ایک نقاب…
میں زخم ہوں— وہاں جا کر کس سے ملتا، نمک سے بھیگے کپڑے وہاں سب نے پہنے تھے۔ ہر چہرے پر ایک نقاب…
یوں در بدر کب تک رہوں، سوچا کہیں آباد ہ…
لبوں پر تیرا نام رکھا ہے، یا رب، تُو نے مجھے سنبھال رکھا ہے۔ شروع کرتا ہوں تیرا نام لے کر، تُو ن…
बेशक हुक़ूमत भी तेरी, क़लम भी तेरे, अख़बार भी तेरे, अदालत भी तेरी, गवाह भी तेरे, सबूत भी तेरे—सब…
ऐ ख़ुदा, दे बता तूने ऐसा क्यों किया, तोड़ दी मेरी हस्ती, तोड़ दी मेरी बस्ती, साथ तूने माँ का जो …
एक अजीब से मोड़ पर खड़ा हूँ, दिल में बहुत कुछ है, मगर कह नहीं पाता हूँ। तुम ख़ूबसूरत हो या …
उदास-उदास शामों से, तन्हा-तन्हा रातों से कुछ महसूस होता है— कि कोई ऐसा रिश्ता हो, जो अटूट हो, …
तेरी यादों में एक याद हूँ, तेरी इबादत की एक फ़रियाद हूँ। उठते थे हाथ जब-जब हिज्र में तेरे, ल…