आस्तीन के साँप — aasteen-ke-saanp — ज़िशान आलम
आस्तीन के साँप – अपनों के धोखे पर हिंदी कविता – ज़िशान आलम दुश्मन अपने ही निकले, शिकायत किस्से…
आस्तीन के साँप – अपनों के धोखे पर हिंदी कविता – ज़िशान आलम दुश्मन अपने ही निकले, शिकायत किस्से…
पुराने ताल्लुक़ – रिश्तों पर हिंदी कविता – ज़िशान आलम पुराने ताल्लुक़ को ऐसे ही नहीं तोड़ा जात…
आज वो हमें जंग के कुछ आदाब सिखाते हैं, मगर हम मोहब्बत में नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। हमारी ख़ामो…
میں زخم ہوں— وہاں جا کر کس سے ملتا، نمک سے بھیگے کپڑے وہاں سب نے پہنے تھے۔ ہر چہرے پر ایک نقاب…
मैं ज़ख़्म हूँ— वहाँ जाकर किससे मिलता, नमक से तर-ब-तर कपड़े वहाँ सबने पहने थे। हर चेहरे पर ए…
مجھ دھار میں پھنسا ہوں، میری کشتی کو کنارے ل…
میں تو مسافر ہوں، یہاں تھوڑی دیر چل …
گرمی کی تپتی دھوپ ہوں میں، سردی کی چاندنی رات ہوں۔ دن کا سورج ہوں، نہ نکلوں تو گھر کا اندھیرا ہو…