इतना मशहूर तो नही में

इतना मशहूर तो नही मै
अल्फा ए कलम रहने दो 
मुद्दतें हो गई है 
अब तो थोड़ा मुस्कुराने दो

मेरा कलम मेरी आवाज बनकर बोलेगा
रफ्ता रफ्ता अपनी लब खोलेगा
आज़माइश ना करना मेरी कभी तुम
मस्त हु में मद-मस्त ना होने दो तुम

लापरवाह नही में रमता मान लो तुम
सदाक़त क्या है मेरी कभी जान लो तुम

हर दर्द की दवा तो नही में 
हर जख्म का मरहम तो नही में 
मेरे अल्फाज़ो से मोहब्बत बरसाने दो 

इतना मशहूर तो नही में 
अल्फा ए कलम रहने दो
itna mashur to nhi me Written by   


Zishan alam zisshu

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