मैं अकेला कहाँ,
साथ तुम्हारी यादें भी तो हैं —
वो यादें, जो एक ख़ूबसूरत लम्हे
से चुरा लाया था मैं।
तुम साथ ना सही,
ये यादें ही तुम्हारे होने का
एहसास दिला जाती हैं।
हम मिले थे — हाँ, मिले थे,
मगर दो मुख़्तलिफ़ मंज़िलों के मुसाफ़िर बनके।
एक अपनी मंज़िल तक पहुँच गया,
और दूसरा... वहीं कहीं,
तुम्हारी यादों में खो गया।

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