मिट्टी का पुतला- MITTI KA PUTLA



मिट्टी का पुतला हूं मिट्टी की खुराक हो जाऊंगा 
मरने के बाद दो गज ज़मी में खाक हो जाऊंगा 

कभी  नहीं भूलता मैं  मेरी हैसियत क्या हैं यहां 
ज़िन्दगी की इस दौड़ में बस नाम बचा जाऊंगा

पानी के एक बुलबुले के मानिंद हैं वजूद हैं मेरा
हल्का सा भी  छलक गया तो खत्म हो जाऊंगा

मुझे नहीं मालूम और कितने दिन का मेहमान हूं
कल किसने देखा  हैं आज भी खत्म हो जाऊंगा

ये वक्त  रेत की  तरह  मेरे हाथ से फिसल रहा हैं 
कल होते होते मैं भी सूरज की तरह डूब जाऊंगा 

बचपन से लेकर जवानी की मंज़िल तक पहुंचा हूं 
सच्चाई ये हैं अब मैं आगे आगे ख़ौफ खा जाऊंगा 





Write ✎✎ by Zishan alam


The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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