मिट्टी का पुतला हूं मिट्टी की खुराक हो जाऊंगा
मरने के बाद दो गज ज़मी में खाक हो जाऊंगा
कभी नहीं भूलता मैं मेरी हैसियत क्या हैं यहां
ज़िन्दगी की इस दौड़ में बस नाम बचा जाऊंगा
पानी के एक बुलबुले के मानिंद हैं वजूद हैं मेरा
हल्का सा भी छलक गया तो खत्म हो जाऊंगा
मुझे नहीं मालूम और कितने दिन का मेहमान हूं
कल किसने देखा हैं आज भी खत्म हो जाऊंगा
ये वक्त रेत की तरह मेरे हाथ से फिसल रहा हैं
कल होते होते मैं भी सूरज की तरह डूब जाऊंगा
बचपन से लेकर जवानी की मंज़िल तक पहुंचा हूं
सच्चाई ये हैं अब मैं आगे आगे ख़ौफ खा जाऊंगा