तमाशा -- TAMASHA

 

 



बीच चौराहे पर उसने उसका तमाशा बना  दिया
मेरी तहज़ीब मैंने उसके सिर पर दुपट्टा रख दिया

बाज़ार में छोड़ गया उसे वो एक समान की तरह 
जैसे कोई आया देखा और वापस वही रख दिया 

जब से वो मुझ से जुदा हुआ तो यूं भटक  रहा हैं
कभी यहां कभी वहां खुद को भटकाके रख दिया 

कभी हम भी उसके नाज़ नखरे शौक से उठते थे
महज़ एक ज़िद ने उसकी तबाह करके रख दिया 

खैर कोई बात नहीं जो हुआ सो हुआ चैन से जीने 
दे मुझे , मैंने माज़ी का किस्सा भुलाकर रख दिया

ये मेरा ज़र्फ हैं मैंने उसकी हालत देखकर मुंह नहीं 
मोड़ा, संभाला खुद को और क़दम आगे रख दिया 




Write by ✎✎ zishan alam







The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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