बीच चौराहे पर उसने उसका तमाशा बना दिया
मेरी तहज़ीब मैंने उसके सिर पर दुपट्टा रख दिया
बाज़ार में छोड़ गया उसे वो एक समान की तरह
जैसे कोई आया देखा और वापस वही रख दिया
जब से वो मुझ से जुदा हुआ तो यूं भटक रहा हैं
कभी यहां कभी वहां खुद को भटकाके रख दिया
कभी हम भी उसके नाज़ नखरे शौक से उठते थे
महज़ एक ज़िद ने उसकी तबाह करके रख दिया
खैर कोई बात नहीं जो हुआ सो हुआ चैन से जीने
दे मुझे , मैंने माज़ी का किस्सा भुलाकर रख दिया
ये मेरा ज़र्फ हैं मैंने उसकी हालत देखकर मुंह नहीं
मोड़ा, संभाला खुद को और क़दम आगे रख दिया
Write by ✎✎ zishan alam
