अजनबी तुम अजनबी हम - AJNABI TUM AJNABI HUM




मैं और तुम हैं एक अधूरे सफ़र के मुसाफिर 
आओ साथ मिलकर चले रफ्ता रफ्ता 
मैं तुम्हे देखता रहूं तुम मुझे देखते रहों 
लबों से ख़ामोशी की चादर हटाकर 
कुछ कहते कहते दूर तक चले रफ्ता रफ्ता 
मैं कौन हूँ तुम कौन हो क्या हो क्यों हो 
भुलाकर माज़ी का ये किस्सा आगे बढ़ते चले रफ्ता रफ्ता 
तुम कुछ कहोगे तो मैं ख़ामोशी से सुनता जाऊंगा 
मगर माज़ी की भूली हुई कोई नज़्म ना दौहराना
रिवायतों के पहरे भी होगें सवालों के दरिया भी होगे 
मगर तुम रिवाजों की सरहदे पार करके 
दूर तक जाना रफ्ता रफ्ता 
सर्द हवा हो तन्हाई की रात हो 
कोई आवाज़ ना कोई बरसात हो 
बस अम्बर के तारों की रौशनी में कोई खास मुलाक़ात हो 
चलो मैं और तुम एक मुकम्मल सफ़र के मुसाफिर हो जाए 
रफ्ता रफ्ता |



ZISHAN ALAM 



The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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