मैं और तुम हैं एक अधूरे सफ़र के मुसाफिर
आओ साथ मिलकर चले रफ्ता रफ्ता
मैं तुम्हे देखता रहूं तुम मुझे देखते रहों
लबों से ख़ामोशी की चादर हटाकर
कुछ कहते कहते दूर तक चले रफ्ता रफ्ता
मैं कौन हूँ तुम कौन हो क्या हो क्यों हो
भुलाकर माज़ी का ये किस्सा आगे बढ़ते चले रफ्ता रफ्ता
तुम कुछ कहोगे तो मैं ख़ामोशी से सुनता जाऊंगा
मगर माज़ी की भूली हुई कोई नज़्म ना दौहराना
रिवायतों के पहरे भी होगें सवालों के दरिया भी होगे
मगर तुम रिवाजों की सरहदे पार करके
दूर तक जाना रफ्ता रफ्ता
सर्द हवा हो तन्हाई की रात हो
कोई आवाज़ ना कोई बरसात हो
बस अम्बर के तारों की रौशनी में कोई खास मुलाक़ात हो
चलो मैं और तुम एक मुकम्मल सफ़र के मुसाफिर हो जाए
रफ्ता रफ्ता |
ZISHAN ALAM
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ROMANTIC POETRY
