एखतेदार -- IKHTEDAR


ना दौलत ना शोहरत ना कोई एखतेदार चाहिए 
मुझे तो बस यहां मेरे सदा होने का हक़ चाहिए 

किसी खानदानी जमीदार का वारिस नहीं हूं मैं
मुझे तो मरने के बाद यहां दो गज़ ज़मी चाहिए

मुफलिसी केआलम में ज़िंदगी गुज़ार दी हैं मैंने 
इतनी सी आरज़ू हैं कफ़न - इज़्ज़त -का चाहिए

मेरे पास कोई वसीयत नहीं मेरे वारिस के लिए 
हैं वसीयत ये अल्फाज़ जिनकी ज़मानत चाहिए 

एक अरसे से कुछ ख़्वाब देखें हैं  मैंने भी  यहां 
वक्त आ गया हैं अब  ख्वाबों की ताबीर चाहिए 

एक  एहसास  था जो मुझे मायूस नहीं होने देता
मायूसी  में  बदल  गया मुझे  वो  एहसास चाहिए


WRITE BY ZISHAN ALAM









 

The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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