ना दौलत ना शोहरत ना कोई एखतेदार चाहिए
मुझे तो बस यहां मेरे सदा होने का हक़ चाहिए
किसी खानदानी जमीदार का वारिस नहीं हूं मैं
मुझे तो मरने के बाद यहां दो गज़ ज़मी चाहिए
मुफलिसी केआलम में ज़िंदगी गुज़ार दी हैं मैंने
इतनी सी आरज़ू हैं कफ़न - इज़्ज़त -का चाहिए
मेरे पास कोई वसीयत नहीं मेरे वारिस के लिए
हैं वसीयत ये अल्फाज़ जिनकी ज़मानत चाहिए
एक अरसे से कुछ ख़्वाब देखें हैं मैंने भी यहां
वक्त आ गया हैं अब ख्वाबों की ताबीर चाहिए
एक एहसास था जो मुझे मायूस नहीं होने देता
मायूसी में बदल गया मुझे वो एहसास चाहिए
WRITE BY ZISHAN ALAM
