नई सुबह का आगाज़ होना चिड़ियों का चहकना मंदिर के शंक से अज़ान का जुल …
जो आए थे अब्र की तरह मेरी ज़िंदगी में वो थोड़ा बरस कर कही चले गए कुछ बूंदे…
कभी उनके लबों पर मेरा ज़िक्र आये …
टूटे पत्तो की तरह हो गए वे अब शाख पर नही जुड़ पाएंगे …
मैं जैसा हूं मुझको वैसा ही रहने दो अभी हाथों में कलम हैं थोडा और लिखने दो …
नफरत के इस दौर में जीना मुश्किल हो गया अब तो अहताज़ाज करना लाज़मी हो गया ह…




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