अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूं - AKSHAR AKSHR CHUM KAR

बनकर वो शोला मरहम में बदल जाता है 
कुछ अंदाज़ नया तो कुछ पुराना होता है 
राहों में पत्थर तेरे बने जो रुकावट 
उसको किनार देता हूं
अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूं
अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूं

कुछ मुस्कान ढाल कर लिखता हूं
कुछ आंसूओ संग दस्ता सुनाता हूं
लिखने का शौक है यारो 
वरना कब का कलम से नाता तोड़ चुका हूं
जर्रा जर्रा कर इकट्ठा उसको अपने मे खफा लेता हूं
अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूँ
अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूं

समंदर बोलू सिकन्दर बोलू
बोलू क्या ये नही में समझ पाता 
जाते जाते वो मेरी आँखों मे दरिया बनकर
पानी छोड़ जाता 
पाने की कोशिश करता में उसको
पर पास जाते जाते कोसो दूर हो जाता हूं
अक्षर अक्षर चुम कर अपना लेता हूं
अक्षर चुम कर अपना लेता हूं

Written by 
Zishan alam zisshu

The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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