हम तो तन्हा थे बस लिखते चले गए
गम खाकर फिर भी मुस्कुराते चले गए
एक वीरान से कमरे में बैठकर
बस लफ़्ज़ों को यूं ही लड़ाते चले गए
धीरे धीरे वक़्त गुज़रता चला गया
हम पन्नो पर लफ़्ज़ों को बिखेरते चले गए
वैसे तो ख़ामोशी पसंद है मुझे
तेरे खातिर लफ़्ज़ों से शोर सराबा कराते चले गए
एक चाँद सा चेहरा यूं आया जिंदगी में
फिर हम लफ़्ज़ों से बरसात कराते चले गए |
Write by -Zishan alam
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