आज सारी कश्तियां जलाकर आया हूं मैं - AAJ SARI KASHTIYAN JALAKAR AAYA HUN MAI

 


आज सारी कश्तियां जलाकर आया हूं मैं
उसको उसी के हाल पर छोड़ आया हूं मैं 

दूरियां जब दिन ब दिन बढ़ने लगी थी तो
फासलों में  और इज़ाफा कर आया हूं मैं

मैंने देखा मिजाज़ बदलते उसका हर -सु 
देखकर मिजाज़ उसका लौट आया हूं मैं

मेरे हाथ की लकीरों में लिखा नहीं था वो
मिटाकर सारी लकीरे हाथ धो आया हूं मैं

मुकद्दर में जो लिखा हैं उसको कैसे बदलूं
रब ने लिखा उसकी रज़ा मान आया हूं मैं

इक वो किताब थी आज भी खुली हुई थी
पढ़ने का मन नहीं था बंद कर आया हूं मैं

अब ना कोई मलाल शिकवा ना शिकायत
तोड़कर सारी बंदिशे उसे भुला आया हूं मैं
  





Write ✎✎ by zishan alam 






 

The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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