बेशुमार मुश्किलें हैं रास्ते में, फिर भी निकल जाऊँगा,
एक मर्तबा मैं भी अपना हौसला आज़मा कर रहूँगा।
खुद को मैंने नासूर घावों से शिद्दत से गुज़ार लिया है,
बनकर नमक का मरहम अब मैं ख़ुद पर लगा जाऊँगा।
वो एक के बाद एक ज़ख़्म देते चले गए हैं मेरे सीने में,
आदत इतनी हो गई है, हर तकलीफ़ से गुज़र जाऊँगा।
बार-बार के मसाइल हैं, एक बार आर-पार की हो जाए,
बता कितना दम है उसमें, मैं उसकी हक़ीक़त लिख जाऊँगा।
तन्हाई की बात मत करो, दोस्ती अच्छी-ख़ासी है मेरी,
सुनाने लग गया दास्ताँ अपनी, तो तुम्हें रुला जाऊँगा।
✍️ ज़िशान आलम