तेरी यादों की गिरफ्त में हैं, बेशक कुछ भी वजह दे दो,
तेरी कैद मेरा मुकद्दर बन गया है, चाहे कोई सज़ा दे दो।
तेरा हर एक ज़ुल्म-ओ-सितम मुस्कुराकर सह लेंगे हम,
पढ़ेंगे तेरे नाम की ही तस्बीह, बस इतनी-सी रज़ा दे दो।
कोई अनोखी फ़रमाइश नहीं कर रहा हूँ मैं, इल्तिज़ा है,
गुनगुनाता फिरूँ तुम्हें, मुझे ऐसी कोई फ़िज़ा दे दो।
एक के बाद एक सजदा करूँ, शब-ए-हिज्र में हाथ उठाऊँ,
माँगूँ रब से तुम्हें फ़र्ज़ नमाज़ में, ऐसी कोई दुआ दे दो।
सूखे दरख़्त के मानिंद हैं, टहनियाँ भी अलहदा हो गईं,
मुस्कुराहट लबों पर नहीं, मुस्कुराने की कोई अदा दे दो।
ना चैन से जी रहा हूँ तेरी याद में, ना मर रहा हूँ कैद में,
साँसें अटक रही हैं अब, मुझे इस मिट्टी की ग़िज़ा दे दो।
✍️ ज़िशान आलम