उम्मीदों का मरकज़ - UMMEDON KA MARKAZ

 

मेरे ख़्वाबों का शहर टूट गया
और मेरी उम्मीदों का मरकज़ गिर गया
उम्र बीत रही हैं अब ये गर्द -ओ-गुबार समेटने में

बेशक़ मेरा शहर टूटा हैं
मेरी उम्मीदों का मरकज़ बिखर गया हैं
शीशे की तरह
लेकिन मेरा हौसला अभी भी सलामत हैं
बिल्कुल मेरे वजूद की तरह ।

जिशान आलम





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