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POETRY
उम्मीदों का मरकज़ - UMMEDON KA MARKAZ
उम्मीदों का मरकज़ - UMMEDON KA MARKAZ
The zishan's view
नवंबर 08, 2022
मेरे ख़्वाबों का शहर टूट गया
और मेरी उम्मीदों का मरकज़ गिर गया
उम्र बीत रही हैं अब ये गर्द -ओ-गुबार समेटने में
बेशक़ मेरा शहर टूटा हैं
मेरी उम्मीदों का मरकज़ बिखर गया हैं
शीशे की तरह
लेकिन मेरा हौसला अभी भी सलामत हैं
बिल्कुल मेरे वजूद की तरह ।
जिशान आलम
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