मुख्यपृष्ठAll उम्मीदों का मरकज़ - UMMEDON KA MARKAZ byThe zishan's view -नवंबर 08, 2022 0 मेरे ख़्वाबों का शहर टूट गयाऔर मेरी उम्मीदों का मरकज़ गिर गयाउम्र बीत रही हैं अब ये गर्द -ओ-गुबार समेटने मेंबेशक़ मेरा शहर टूटा हैंमेरी उम्मीदों का मरकज़ बिखर गया हैंशीशे की तरहलेकिन मेरा हौसला अभी भी सलामत हैंबिल्कुल मेरे वजूद की तरह ।जिशान आलम Tags All POETRY Facebook Twitter