उम्मीदों का मरकज़ - UMMEDON KA MARKAZ

 

मेरे ख़्वाबों का शहर टूट गया
और मेरी उम्मीदों का मरकज़ गिर गया
उम्र बीत रही हैं अब ये गर्द -ओ-गुबार समेटने में

बेशक़ मेरा शहर टूटा हैं
मेरी उम्मीदों का मरकज़ बिखर गया हैं
शीशे की तरह
लेकिन मेरा हौसला अभी भी सलामत हैं
बिल्कुल मेरे वजूद की तरह ।

जिशान आलम





The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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