दुआ/Dua

 

मेरे अधूरे ख़्वाबों को मुकम्मल कर दे मौला
मुझे  कोई रास्ता या मंज़िल दिखा दे मौला

मैं गम के अंधेरों के साए में चल रहा हूं
मेरे मालिक मुझे कोई रोशनी तो दिखा दे मौला

मैं ग़मो का समंदर बन गया और फस गया मझधार में
तेरे सिवा कोई नही जो मेरी कश्ती को किनारे लगा दे मौला

जिस्म में बहुत आज़ार हैं अब चलने की कैफ़ियत नही
हकिमों के पास दवा नही हाकिम की तवज्जो दरकार हैं मौला

मैं तो गुमनाम राह का भटका हुआ मायूस सा मिस्कीन हूं
तेरी जात सबसे अफ़ज़ल हैं मेरी मुस्कुराहट को उज़्र दे दे मौला

बहुत दुःख दर्द समेट के रखे हैं सीने में मैंने क्या बताऊं
कम से कम मुझे मेरे हिस्से की हँसी तो दे दे मौला

शायद तू मुझ से खफ़ा हैं या तेरी नज़र मुझ पर नही
गर खफ़ा है तू मुझ से तो मेरी गलतियों को माफ कर दे मौला

मैं तेरा होकर तेरा नही बस अपनी फानी दुनिया में मगन हूं
हाए कितना खुदगर्ज़ हूं मैं मुसिबत में बस तुझे पुकारता हूं मौला




 Write by- Zishan alam




The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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