सरहदी इलाकों में सापों का आदि हो चुका हूं मैं
इसलिए अपने साथ दरयाख्त लेकर चलता हूं मैं
कौन कब ,कैसे, किस तरह डसेगा मुझे डर नहीं
क्योंकि दोचार सापों को आस्तीन में पालता हूं मैं
दूध पिलाया जिन्हें हर तरफ जहर उगला उन्होंने
इसलिए हर तरह के जहर को पहचान लेता हूं मैं
बेखौफ होकर निकलता हूं मैं सरहदी इलाकों में
परवाह नहीं सांपों की सारी नस्लों को जनता हूं मैं
जब जब आस्तीन के सपों ने डसा मुझे जहर नहीं
चढ़ा मुझे, क्योंकि इन सापों को दूध पिलाता हूं मैं
फन उठाए घूमते हैं नफ़रत का जहर लिए हुए मगर
ऐसे सांपों का फन कुचलना अच्छे से जनता हूं मैं
Write by ✎✎ zishan alam
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DHOKHA POETRY
