किसके ज़ख्म भरे यहां-- KISKE ZAKHM BHARE YAHAN

 

किसके ज़ख्म भरे यहां कौन घर जाएगा
 देखना वो शख्स पलटकर वापस आएगा

अंधेरों से कह दो वो उजाले से ना टकराए
 वरना फिर कौन यहां शमा जलाने आएगा

उसकी कागज़ की कश्ती हैं तो क्या हुआ 
डूबेगा तो खुद को साहिल तक ले आएगा

एक उम्मीद पर कायम हैं ये बे जोड रिश्ता
 एक दिन बहुत एहतराम से जाना जाएगा

हादसे तो होते थे होते रहेंगे इसने नया क्या
 सिकंदर तो वो हैं जो मंजिल तलक जाएगा

ज़ख्म हरे हैं भरे नहीं अभी तलक देखना ये हैं 
कौन इन  ज़ख्मों  का मरहम  लेकर आएगा



Write by ✎✎ zishan alam


 

The zishan's view

This is zishan alam .Writer .Poet.and Author of Lafzon ke mousam me .Social Activist.मुस्लिम का बेटा हूं हिंदू का भाई हूं लेकिन दीवाना हूं इंसानियत का //

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